शिव और सती की अमर प्रेम कथा

शिव और सती की अमर प्रेम कहानी –

Shiv and Sati Love Story in Hindi – नमस्कार दोस्तों मैं आशा करता हु कि आप सभी बहुत अच्छे होंगे, आज मैं आपके सामने लेकर आया हुं, भगवान शिव और माता सती की प्रेम कहानी, तो आइये देखते है कि क्या होता है, सर्वप्रथम ब्रह्मा जी की बात मानकर सती का विवाह भगवान शिव के साथ कर दिया,
माता सती कैलाश में जाकर भगवान शिव के साथ रहने लगी यद्यपि भगवान शिव, दक्ष के जमाई थे,

किंतु एक दिन ऐसी घटना घटी जिसके कारण दक्ष के हृदय में भगवान शिव के प्रति बेर आ हो गया, एक बार ब्रह्मा ने धर्म के निरूपण के लिए एक सभा का आयोजन किया था, सभी बड़े बड़े देवता सभा में एकत्रित थे, भगवान शिव भी एक और बेठे थे, सभामंडल में दक्ष का आगमन हुआ, दक्ष के आते ही सभी देवता उठकर खड़े हो गए,

पर भगवान शिव खड़े नहीं हुए, उन्होंने दक्ष को प्रणाम भी नहीं किया, इसके परिणाम स्वरूप दक्ष ने अपमान का अनुभव किया, केवल यही नहीं उनके ह्रद्रय में भगवान शिव के प्रति आग जल उठी, अब वो उनसे बदला लेने के लिए समय और अवसर की प्रतीक्षा करने लगे, लेकिन भगवान शिव को किसी के मान या अपमान से क्या मतलब, वह तो सप्त ऋषि हैं,

उनको चारों और अमृत दिखाई पड़ता है, भगवान शिव के नाच में दिन-रात बस  राम-राम रटते रहते है, एक दिन माता सती के मन में जिज्ञासा उत्पन्न हो उठी अवसर पाकर भगवान शिव से प्रश्न किया,

आप राम-राम क्यों कहते हैं यह राम कौन है शिव ने उत्तर दिया सती राम आदिपुरुष है, किंतु माता सती के कंठ से बाद नीचे नहीं उतरी, आखिर अयोध्या के राजा दशरथ जी के पुत्र राम आदिपुरुष के अवतार कैसे हो सकते हैं?

अभी तो आजकल अपनी पत्नी सीता के साथ वियोग में, दंडक वन उत्तर के भक्ति विचरण कर रहे हैं, वृक्ष और लताओं से उनका पता पूछते फिर रहे हैं, यदि वह आदिपुरुष के अवतार होते, तो क्या इस प्रकार वन का आचरण करते?

माता सती के मन में राम की परीक्षा लेने का विचार उत्पन्न हुआ, वे माता सीता का रूप धारण करके दंडक वन जा पहुंची, और श्रीराम के सामने जाकर प्रकट हुई, भगवान राम ने माता सती को माता सीता के रूप में देख कर कहा माता आप यहां अकेली वन में कहां घूम रही हैं?

बाबा विश्वनाथ कहां है राम का प्रश्न सुनकर माता सती से कुछ उत्तर देते नहीं बना, और माता सती अदृश्य हो गई और मन ही मन पश्चाताप करने लगी कि मैंने व्यर्थ ही श्रीराम पर संदेह किया राम सच में आदिपुरुष के अवतार हैं, सती जब लौटकर वापिस जब कैलाश गई, तब  भगवान शिव ने उन्हें आते देखा तो कहा कि हे सती तुमने सीता के रूप में राम की परीक्षा ले कर अच्छा नहीं किया,

माता सीता मेरे आराध्या है, अब मेरा ध्यान घनी कैसे रह सकती हैं, अतः इस जन्म में हम और तुम पति और पत्नी के रूप में नहीं मिल सकते है, पर अब क्या हो सकता था शिव से मुंह से निकली हुई बात असत्य कैसे हो सकती थी, शिव जी  समाधी में लीन हों गए, दुख और पश्चाताप की लहरों में डूबने लगे,

एक दिन माता सती और भगवान शिव कैलाश पर्वत पर बैठकर परस्पर वार्तालाप कर रहे थे, उसी समय आकाश में कई विमान, माता सती के घर की ओर जाते हुए दिखाई पड़े सती ने इन विमानों को देखकर भगवान शिव से पूछा,

प्रभु यह सभी विमान किसके हैं? और कहां जा रहे हैं?

भगवान शिव ने उत्तर दिया आपके पिता ने यज्ञ की रचना की है, देवता और देवियां इन विमानों में बैठकर यज्ञ में सम्मिलित होने जा रही है, सती ने दूसरा प्रश्न किया लेकिन मेरे पिता ने यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए आपको नहीं बुलाया?

सती आपके पिता मुझसे बैर रखते हैं, फिर भला मुझे क्यों बुलाने लगें, सती मन ही मन सोचने लगी और फिर बोली प्रभु यज्ञ के अवसर पर अवश्य मेरी बहने आएंगी, उनसे मिले बहुत दिन हो गए यदि आपकी अनुमति हो तो मैं भी यज्ञ में अपने पिता के घर जाना चाहती हूं, यज्ञ में सम्मिलित हो जाऊंगी और बहनों से मिलने का भी अवसर मिल जाएगा,

भगवान शिव ने उत्तर दिया मेरे विचार से इस समय वहां जाना उचित नहीं होगा, आपके पिता मुझ से बैर रखते हैं, हो सकता है वह आप का भी अपमान करें, बिना बुलाए किसी के घर जाना, उचित नहीं होता,

माता सती बोलीं, लेकिन वह मेरे पिता है, पिता की पुत्री को अपने पिता के घर जाने के लिए कैसा निमंत्रण, आप देखिएगा मैं जाऊंगी तो सभी प्रसन्न होंगे,

Shiv and Sati Love Story in Hindi –

सती विवाहित लड़की को बिना बुलाए पिता के घर नहीं जाना चाहिए, क्योंकि विवाह होने पर लड़कियां अपने पति की हो जाती है, पिता के घर से उसका संबंध टूट जाता है, लेकिन सती घर जाने के लिए जिद्द करती रही, अपनी बात बार-बार दोहराती रही, उनकी इच्छा देखकर भगवान शिव ने उनको जाने की अनुमति दे दी,

उनके साथ अपना एक गण भी कर दिया, उस गण का नाम था वीरभद्र, सती वीरभद्र के साथ अपने पिता के घर गई, किंतु उनसे किसी ने भी प्रेम पूर्वक वार्तालाप नहीं किया, दक्ष ने उनको देखकर कहा, तुम क्या मैरा यहां पर अपमान करने आई हो?

अपनी बहनों को देखो वह किस प्रकार भांति भांति के सुंदर वस्त्र पहनकर और तुम्हारे शरीर पर मात्र बाग्म्बर है, तुम्हारा पति, शमशान नागौर भूतों का वासशक है, वो तुम्हें बाग्म्बर छोड़कर और पहना ही क्या सकता हैं?

दक्ष के वार्तालाप से सती के मन में पश्चाताप का सागर उमड़ पड़ा,,वह सोचने लगी, मैंने यहां आकर अच्छा नहीं किया, भगवान ठीक ही कह रहे थे, बिना बुलाए पिता के घर भी नहीं जाना चाहिए, पर अब क्या हो सकता है, अब तो आई गई हूं पिता के कटु और अपमानजनक शब्द सुनकर सती मोन रही,

वे उस यज्ञ में गई जहां सभी देवताओं ऋषि जनक बैठे थे तथा यज्ञ में दूदू करती हुई अग्नि में आहुति डाली जा रही थी, सती ने यज्ञ मंडप में सभी देवताओं के स्थान देखें, किंतु भगवान शिव का स्थान नहीं देखा,

भगवान शिव का स्थान ना देकर, अपने पिता से बोली यज्ञ में तो सब के स्थान दिखाई पड़ रहे हैं, किंतु कैलाशपति का स्थान नहीं है, आपने उनका स्थान क्यों नहीं दिया, दक्षिणी गर्व से उत्तर दिया मैं तुम्हारे पति को देवता नहीं समझता,

वो तो भूतों का स्वामी, नग्न रहने वाला और हड्डियों की माला धारण करने वाला है, वह देवता की पंक्तियों में बैठने योग्य नहीं है, उसे कौन स्थान देगा, सती के नेत्र लाल हो उठे, उनकी बोहे कुटिल हो बेठी, उनका मुख, मंडल प्रलय के सूर्य की भांति तेजो तिप्त होता दिखाई पड़ रहा था,

उन्होंने कहा ओहो ,मैं इन शब्दों को कैसे सुन रही हूँ, मुझे धिक्कार है, देवताओं तुम्हें भी दिखता है, तुम्हें कैलाश पति के लिए, इन शब्दों को कैसे सुन रहे हो, जो मंगल के प्रतीक हैं, जो क्षण मात्र में संपूर्ण सृष्टि को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं, वे मेरे स्वामी है,

नारी के लिए उनका पति ही स्वर्ग होता है, जो नारी अपने पति के लिए अपमानजनक शब्दों को सुनती है, उसे नर्क में जाना पड़ता है, पृथ्वी सुनो, आकाश सुनो, और देवताओं तुम भी सुनो, मेरे पिता ने मेरें पति का अपमान किया है, मैं अब एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकती,

माता सती अपने कथन को समाप्त करती हुई, अग्निकुंड में कूद पड़ी, जलती हुई आरोपियों के साथ उनका शरीर भी जलने लगा, यज्ञ मंडल में खलबली पैदा हो गई, हाहाकार मच गया, देवता उठकर खड़े हो गए, वीरभद्र खुद से कांप उठेगी,

चलो चल कर यज्ञ का विध्वंस करने लगी, देवता और ऋषि भागने लगे, वीरभद्र ने देखते ही देखते दक्ष का मस्तक काट कर फेंक दिया यह समाचार भगवान शिव के कानों में भी पड़ा,

वे प्रचंड आंधी के प्रति वंहा जा पहुंचे और सती के जले हुए शरीर को देखकर, भगवान शिव अपने आप को भूल गये, सती के प्रेम और भक्ति ने शंकर के मन को व्याकुल कर दिया, उन शंकर के मन को व्याकुल कर दिया, जिन्होंने काम पर भी विजय प्राप्त की है, और जो सारी सृष्टि को नष्ट करने की क्षमता रखते है, वे सती के प्रेम में खो गए, वे सुध बुध खो गए,

और तांडव करने लगें, भगवान् ने उन मंत्र के भांति, सती के जले हुए शरीर को कंधे पर रख लिया, वे सभी दिशाओं में भ्रमण करने लगे, शिव और सती के इस अलौकिक प्रेम को देखकर, पृथ्वी रुक गई, हवा रुक गई, जल का प्रवाह ठहर गया और रुक गई,

देवताओं की सांसे अटकी हैं,  सृष्टि व्याकुल हो गई, भयानक संकट की स्थिति देखकर, सृष्टि के पालक भगवान विष्णु आगे बढ़े, देव भगवान की बेसुधी में अपने चक्र से सती की एक एक अंग को काट काट कर गिराने लगे,

धरती के 51 स्थानों पर सती के अंग कट-कट कर गिरे, जब सती के सारे अंग कट कर गिर गए, तब भगवान शिव पुनः अपने आप में आ गए, तो पुनः सृष्टि के सारे कार्य चलने लगे,

धरती पर जिन 51 स्थानों पर सती के अंग कटकट गिरे थे, आज शक्ति के स्थान माने जाते हैं आज 51 स्थानों में सती का पूजन होता है उपासना होती है, धन्य है भगवान शिव ओर सती का प्रेम और इसी के साथ आज की कहानी यंही पर समाप्त होती है,

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दोस्तों अगर आपको लगता है, कि इस कहानी से आपको कुछ सिखने को मिला या कुछ नया मिला है, तो हमें कमेन्ट करके जरुर बताएं और इसे आप अपने दोस्तों के साथ भी शेयर कर सकते है, यंहा तक पड़ने के लिए आप सभी का दिल से धन्यवाद्, क्योकि बहुत कम लोग होते है, जो आज के इस मॉडर्न युग मै कहानी को पूरा पड़ने के लिए बहुत जुनून चाहिये और वो जूनून आप के अंदर है, इसीलिए दुबारा आप सभी का दिल से बहुत-बहुत धन्यवाद्!

 

 

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